
सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का…
कुछ ऐसा ही मामला इन दिनों दुमका नगर परिषद में खूब चर्चा बटोर रहा है।
जब से नगर परिषद के नई नवेली अध्यक्ष महोदय चुनाव जीतकर आए हैं, तब से शहर में सफाई अभियान की खूब वाहवाही हो रही है। नालियों की सफाई, कचरे की सफाई, शहर को चमकाने की कवायद… लोग भी कह उठे — “अरे अध्यक्ष हो तो ऐसा!”
लेकिन जनाब… कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब नाली की सफाई करते-करते कुछ लोगों की निजी जमीन पर जमी वर्षों पुरानी “सरकारी धूल” भी साफ होने लगी।
जी हाँ…
जिन जमीनों पर वर्षों पहले सरकारी निर्माण हुए… जहां नगर पालिका और विधायक फंड से शौचालय बने… आज अचानक कहा जा रहा है कि जमीन निजी है।
इतनी सफाई हुई कि अब लोगों को अपनी जमीन धुंधली आंखों से भी साफ दिखाई देने लगी… और चर्चा तो यहां तक कि अब उसी जमीन पर बिल्डिंग और दुकान खड़ी करने की तैयारी है!
पूरा मामला दुमका के पटवारी गली स्थित उस शौचालय निर्माण से जुड़ा है, जहां 1984-85 के दौरान नगर पालिका द्वारा आहूत निविदा के तहत निर्माण कराया गया था। उस समय वार्ड कमिश्नर स्वर्गीय रघुनंदन भगत जी बताए जाते हैं और निर्माण कार्य सहायक अभियंता जितेंद्र चौधरी की देखरेख में पूरा हुआ था। दावा यह भी कि उस समय विधायक निधि के फंड से यह निर्माण कराया गया था और इसके रिकॉर्ड आज भी मौजूद हैं।
अब सवाल यह उठता है कि —
अगर सरकारी रिकॉर्ड में यह जगह शौचालय निर्माण के लिए उपयोग हुई थी, तो फिर आज उसी जगह पर दुकान निर्माण की बात कैसे हो रही है?
नगर परिषद अध्यक्ष का कहना है कि नगर परिषद के अमीन और सरकारी अमीन से नापी कराई गई, दस्तावेज देखे गए और जमीन निजी पाई गई। इसलिए जमीन मालिक को स्वतंत्र कर दिया गया है।
लेकिन कहानी यहीं से और ज्यादा उलझ जाती है।
जब जोहार न्यूज़ के रिपोर्टर ने नगर पालिका के अमीन और सरकारी अमीन से बात की, तो दोनों ने साफ इनकार कर दिया कि पटवारी गली स्थित इस जमीन की किसी प्रकार की नापी उनके द्वारा नहीं की गई है।
अब सबसे बड़ा सवाल सीधे नगर परिषद अध्यक्ष के दावे पर खड़ा हो रहा है।
अगर अमीनों ने नापी ही नहीं की…
तो फिर अध्यक्ष महोदय ने किस आधार पर जमीन को निजी घोषित कर दिया?
किस रिपोर्ट को देखकर यह फैसला लिया गया?
क्या कोई लिखित सर्वे रिपोर्ट मौजूद है?
या फिर पूरा मामला सिर्फ मौखिक दावों के भरोसे चल रहा है?
अगर जमीन निजी थी…
तो फिर सरकारी पैसा वहां खर्च कैसे हुआ?
बिना अधिग्रहण, बिना मुआवजा, बिना कानूनी प्रक्रिया सरकारी निर्माण किस नियम के तहत किया गया?
किस अधिकारी ने अनुमति दी?
किस जनप्रतिनिधि ने फाइल पास की?
और अगर सरकारी निर्माण वैध था, तो अब उसका स्वरूप बदलने की अनुमति किसने दी?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 300A साफ कहता है कि किसी व्यक्ति की संपत्ति उससे बिना कानूनी प्रक्रिया के नहीं ली जा सकती। वहीं Land Acquisition कानून और नगर पालिका नियम भी यही कहते हैं कि निजी जमीन पर सार्वजनिक निर्माण के लिए कानूनी अधिग्रहण या लिखित सहमति जरूरी है।
अब सवाल सिर्फ एक शौचालय का नहीं है…
सवाल सरकारी पैसे का है…
सवाल जवाबदेही का है…
और सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें गरीब की जमीन पर वर्षों तक सरकारी निर्माण होता है, लेकिन बाद में पूरा मामला निजी बनाम सरकारी की बहस में बदल जाता है।
शहर में अब लोग पूछ रहे हैं —
क्या सफाई सिर्फ नालियों की हो रही है?
या फिर पुरानी फाइलों की धूल भी झाड़ी जा रही है?
और सबसे बड़ा सवाल —
अगर बिना अधिग्रहण किसी गरीब की जमीन पर सरकारी निर्माण हुआ, तो जिम्मेदार कौन?
क्या उन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर भी कार्रवाई होगी जिन्होंने सरकारी फंड लगाकर निर्माण कराया?
या फिर पूरा मामला सिर्फ “नापी” और “लेटर पैड” तक ही सीमित रह जाएगा?





